| Indian Railways News => | Topic started by nikhilndls on Aug 23, 2013 - 18:00:35 PM |
Title - 58 साल बाद भी नहीं हुआ अस्पताल का इलाजPosted by : nikhilndls on Aug 23, 2013 - 18:00:35 PM |
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कोसी क्षेत्र का मुख्य द्वार माने जाने वाले मानसी जंक्शन पर अवस्थित रेल अस्पताल 58 वर्षो से दो बेडों का ही है। रेलवे ने कभी इसके विकास के बारे में नहीं सोचा। मानसी से पूरब 116 किमी पर कटिहार में व 64 किमी पश्चिम गढ़हरा में रेलवे का अस्पताल है। इस बीच 1955 में यहां दो बेड का अस्पताल खोला गया था ताकि सहरसा लाइन के यात्रियों को जरूरत पड़ने पर चिकित्सा सुविधा दी जा सके। उस समय एक डॉक्टर व चार कर्मियों के पद स्वीकृत किए गए थे, आज भी वही स्थिति है। यहां मलहम-पट्टी तक की व्यवस्था नहीं है। इसका काम महज गढ़हारा रेफर करना रह गया है। रेल यात्रियों को यात्रा के दौरान पेट या सिर में अधिक दर्द या बुखार आ जाए तो तैनात नर्स से कुछ दवाएं मिल सकती हैं। डॉक्टर कब आते और कब जाते हैं, इसे देखने वाला कोई नहीं है। जब आते हैं तो हाजिर बना लेते हैं। वैसे रजिस्टर में दर्ज उपस्थिति के अनुसार 19 अगस्त को धमारा घाट स्टेशन पर रेल हादसे के बाद वे वहां पहुंच गए थे। लोगों का कहना है कि मानसी रेलवे अस्पताल से 12 किलोमीटर की दूरी पर धमारा में घटना के बाद कई लोग उपचार के अभाव में तड़प-तड़प कर मर गए। अस्पताल में जांच व ऑपरेशन की सुविधा होती तो हादसे में जख्मी लोगों को 20 किमी दूर सदर अस्पताल खगड़िया भेजने की नौबत नहीं आती। एएनएम सीमा कुमारी ने बताया कि यहां सिर्फ दो ही बेड हैं। सिर्फ घायलों का प्राथमिक उपचार यहां किया जाता है। आउटसोर्सिग की कोई सुविधा नहीं है। इस अस्पताल में पहले परिवार नियोजन का ऑपरेशन होता था लेकिन कई वर्षो से वह भी बंद हो गया। मरीजों के बेड भी क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। वहीं डॉ. विकास कुमार ने मोबाइल पर बताया कि अस्पताल में रात्रि में इलाज की कोई सुविधा नहीं है। सिर्फ इमरजेंसी की सुविधा होती है। नाइट गार्ड भी नहीं है। वैसे उन्होंने दावा किया कि दवा पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। अस्पताल में दूरभाष तक नहीं है। स्थानीय जदयू नेता बलवीर चांद कहते हैं कि अस्पताल सिर्फ आरामगाह बनकर रह गया है। डॉक्टर कभी अस्पताल आते हैं, कभी नहीं। मरीज अस्पताल से लौटकर चला जाता है। |