Indian Railways News => Topic started by nikhilndls on Mar 03, 2013 - 20:00:04 PM


Title - घाटे में ट्रेनें, ट्रैक पर दबाव फिर भी नई गाड़ियों की बौछार
Posted by : nikhilndls on Mar 03, 2013 - 20:00:04 PM

नई दिल्ली  । पांच साल, पांच मंत्री और 579 नई ट्रेनें। औसतन हर साल 100 से ज्यादा ट्रेनों का एलान। इसके मुकाबले ट्रैक में महज औसतन 400 किलोमीटर की सालाना बढ़ोतरी। बिना किसी अध्ययन या सर्वे के अंधाधुंध ट्रेनें चलाते जाने का ही असर है कि विभिन्न जोनों में सैकड़ों ट्रेनें घाटे में चल रही हैं। इसके बावजूद इस गैर पेशवराना रवैये को तकरीबन हर रेलमंत्री ने तरजीह दी है। रेलमंत्री पवन बंसल भी इससे मुक्त नहीं रहे। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक [कैग] ने इस ढर्रे पर सवाल खड़े किए हैं।

ट्रेनों के मामले में जरा पिछले पांच वर्षो के ट्रेंड पर नजर तो दौड़ाइए। वर्ष 2009-10 में रेलमंत्री ममता बनर्जी ने 69 नई ट्रेनों का एलान किया था। इसके बाद 2010-11 में उन्होंने 151 और ट्रेनों का एलान कर दिया। वर्ष 2011-12 में फिर उन्होंने 140 और ट्रेनें चला दीं। फिर आए दिनेश त्रिवेदी जिन्होंने 2012-13 में अपनी नेता का अनुसरण करते हुए 113 नई ट्रेनों की घोषणा रेल बजट में कर डाली। लंबे अरसे बाद कांग्रेस के कोटे से रेलमंत्री बने पवन बंसल से उम्मीद थी कि वह इस भेड़चाल को बदलेंगे। लेकिन उन्होंने भी लीक से हटना उचित नहीं समझा। अपने पहले रेल बजट को आखिरी मानते हुए उन्होंने भी पूरी 106 नई ट्रेनें दौड़ा दीं। ये तो हुईं सिर्फ नई ट्रेनें। पुरानी ट्रेनों के विस्तार व फेरे बढ़ाने का जिक्र नहीं किया गया है। उन्हें मिला दें तो पांच सालों में ट्रेनों का आंकड़ा 1,000 से भी ज्यादा पहुंच जाएगा।

इसी ट्रेंड को देखने के बाद कुछ साल पहले रेलवे की परफॉर्मेस ऑडिट रिपोर्ट में कैग को कहना पड़ा था कि नई ट्रेनों की घोषणा करते वक्त और उन्हें चलाए जाने के बाद यह मूल्यांकन होना चाहिए कि इनसे कितना नफा या नुकसान हो रहा है। कहीं ये खाली तो नहीं चल रहीं, क्योंकि रेलवे के कॉरपोरेट प्लान में कहा गया है कि नौ जोनों में चल रही तकरीबन 30 फीसद ट्रेनें घाटे में हैं। इस पर रेलवे ने तर्क दिया कि ट्रेनों का संचालन भावी संभावित यातायात के मद्देनजर किया जाता है। रेलवे ने कुछ ट्रेनों में संभावित यातायात के आंकड़े भी दिए, लेकिन कैग ने इन्हें खारिज कर दिया है। कैग ने रेलवे से पूछा है कि इन आंकड़ों का आधार क्या है। क्या इसके लिए कोई सर्वे कराया गया? बिना सर्वे या वैज्ञानिक आधार के इन आंकड़ों का कोई मायने नहीं है।

कैग ही क्यों, अपने कार्यकलापों को लेकर किसी के भी सवाल का रेलवे के पास कोई संतोषजनक उत्तर नहीं होता। उसके जवाब प्राय: चलताऊ या टरकाऊ होते हैं। ऐसा शायद इसलिए है, क्योंकि आधे-अधूरे या गलत जवाबों के लिए रेलवे अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं होती।