Indian Railways News => Topic started by chotelal on Jul 07, 2013 - 04:00:19 AM


Title - बेपटरी रेल
Posted by : chotelal on Jul 07, 2013 - 04:00:19 AM

रेलवे को सबसे अधिक राजस्व देने वाला झारखंड परियोजनाओं के मोर्चे पर घनघोर उपेक्षा का शिकार है. अनुपमा की रिपोर्ट.

जब भी झारखंड और रेल का जिक्र आता है तो यह विडंबना सबसे पहले दिमाग पर दस्तक देती है कि आनुपातिक तौर पर रेल विभाग को सर्वाधिक राजस्व दिलाने के बावजूद झारखंड में रेल सुविधाएं सबसे प्रतिकूल स्थिति में हैं. आंकड़ों के मुताबिक रेल मंत्रालय को होने वाली कुल राजस्व प्राप्ति में 40 प्रतिशत हिस्सा झारखंड से आता है जबकि इस राज्य में उन अधूरी रेल परियोजनाओं की भी पूरी फेहरिस्त है जिनकी घोषणा हुए एक दशक से ज्यादा वक्त बीत गया है.

आजादी के छह दशक बाद भी रेलवे झारखंड में सवारियों की सुविधाओं पर माल ढुलाई को तरजीह देता नजर आता है. हम चाईबासा में रहने वाले प्रो. अशोक सेन की बातों को याद करते हैं जिन्होंने कहा था, ‘अगर आपको पूरे झारखंड में रेल का हाल जानना हो तो सिर्फ हमारे इलाके से जान सकती हैं. चाईबासा कोल्हान का एक प्रमुख स्थान है. यहां से जमशेदपुर के बीच अंग्रेजों के जमाने में भी एक ही सवारी गाड़ी चलती थी, विगत वर्ष तक भी एक ही चलती रही. बहुत आंदोलन के बाद एक और गाड़ी का ठहराव हुआ है. अंग्रेजों ने इसे मालगाड़ी के लिए बनाया था, अब के शासक भी इंसानों की बजाय माल को ही ज्यादा तरजीह देते हैं.’ प्रो. अशोक सेन की बातों को अगर पूरे झारखंड के संदर्भ में देखें तो भी स्थितियां कुछ वैसी ही दिखती हैं. सवारी गाड़ियों का टोटा और मालगाड़ियों की भरमार. झारखंड की रेल लाइन उन इलाकों से ही गुजरती हुई ज्यादा दिखेगी जहां से माल की ढुलाई ज्यादा होनी है. वहीं जिन इलाकों में नागरिक सेवाओं के लिए रेलवे की सेवा बहाल होनी है, वह पिछले कई सालों से या तो अधर में लटकी हुई है या जिन योजनाओं के सपने दिखाए भी गए हैं, अधिकांश कछुआ गति से चल रही हैं.